गुमदेश के चैतोला मेले में तीसरे व अंतिम दिन लगा यहां विशाल मेला।





*मेरो पहाड़*
चंपावत /लोहाघाट। गुमदेश के प्रसिद्ध चैतोला मेले के तीसरे एवं अंतिम दिन चमू देवता द्वारा समूचे गुमदेश क्षेत्र में आतंक का पर्याय बने बकासुर नाम के राक्षसका अंत किए जाने एवं उसे चमदेवल के मैदान में ही दफन किए जाने की खुशी में मेला आयोजित किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में लोग “पस्यारा” कहते हैं। इस दिन यहां सर्वत्र खुशी का माहौल रहता है। कहीं कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता। अलबत्ता चमू देवता के मंदिर में लोग अपना शीश नवाने के लिए दिनभर आते रहते हैं। गुमदेश के लोग चमू देवता को अपना इष्ट, कुल देवता एवं रक्षक मानते आ रहे हैं। कोई भी मांगलिक कार्य बगैर चमू देवता की आज्ञा के बिना नहीं किया जाता है। यहां मेले का तीसरा दिन लोगों की खरीदारी में ही व्यतीत होता है। पिछले कई दशकों से यहां का यह पारंपरिक मेला शांतिपूर्वक रूप से संपन्न होने के कारण अब यहां बड़ी संख्या में बाहर से भी व्यापारी आने लगे हैं। समय के साथ चमदेवल में नागरिक सुविधाओं का विस्तार होता जा रहा है। मेले के साथ यहां के शूरवीर धौंनियों के पराक्रम के भी कई किस्से जुड़े हुए हैं। मंदिर परिसरसे लगे धौंनीसिलिंग,चौपाता, न्यौलटुकरा, बस्कुनी आदि गांव धौंनियो के ही हैं। प्रसिद्ध क्रिकेट सम्राट महेंद्र सिंह धौनी के वंशज यहीं से अल्मोड़ा के सालम गांव गए थे। धौनी धौनियो की चार राठें यहां महर व फर्त्याल धड़े में बंटी हुई हैं। पहले यहां भी अपनी प्रभुसत्ता को लेकर महर व फर्त्यालों के बीच बग्वाल हुआ करती थी। यहां मेले में महिलाओं द्वारा पारंपरिक परिधानों में चमू देवता की वीरता के गीत गाए जाते हैं, जिनको स्थानीय भाषा में ठुस्के कहा जाता है। जिसमें हर महिला शामिल होने के लिए गर्व का अनुभव करती है। जैसे “जै भगत वनवास आया पांडव, खांडो रची गया शिव मंडल देवता”। चमू देवता की इस क्षेत्र में इतनी यश, कीर्ति व लोगों में आस्था है कि यहां की अन्यत्र ब्याही बेटियां मेले में शामिल होकर अपने कुल देवता का आशीर्वाद लेने के लिए जरूर आती हैं। मंदिर के आचार्य मदन कलौनी के अनुसार इस मेले की सर्वाधिक विशेषता यह है कि यहां शताब्दियों पूर्व पूर्वजों द्वारा चमू देवता के सिंहासन डोले एवं उनके पराक्रम के गीतों की जो परंपराएं स्थापित की गई थी, उनका अक्षरशः यहां उनके वंशज पालन करते आ रहे हैं।






